सूरज से गुफ्तगू #21

सुन शायद ये सब ख़तम करना होगा तू समज, शायद वो ही बेहतर होगा, कुछ ज्यादा ही बड़े सपने देख लिए थे मैनें, ये कैसे बताऊ इकरस की कहानी क्या थी ये तुजे कैसे समजाउ। इकरस (Icarus: Icarus, in Greek mythology, son of the inventor Daedalus who perished by flying too near the Sun with waxen wings.)Continue reading “सूरज से गुफ्तगू #21”

सूरज से गुफ्तगू #20

तेरे आने का वक़्त हो गया है पर जो सपनो में तू ही है उसका क्या करू, तू ही बता तेरे साथ, सपनो में या खुदसे दूर असलियत में, किसे चुन। Read more: सूरज से गुफ्तगू #19

सूरज से गुफ्तगू #19

तुम एक ख्वाब होतुम से मिलने की एक अनकही चाहत है,कब तक नज़्मों में बाते करू तुमसेकब तक वो किताबो वाला इश्क़ करू तुमसे?अब है तेरी बारी, मुक्कम्मल कर मेरे ख्वाबचाहे फिर क्यों न करनी पड़े जंग तुजे उसे रब से ही आज। Read More: सूरज से गुफ्तगू #18 PS: If anyone remembers, I have aContinue reading “सूरज से गुफ्तगू #19”

सूरज से गुफ्तगू #18

कई दिनों से तुजसे मुलाकात नहीं हुई हैं ये भीगी बारिश से जैसे नफरत सी हुई हैं, तू ही कहता था, तेरे बिना मेरा अस्तित्व नहीं तो अब ये तू ही बता, तेरे बिना मैं खोकली बन_ पर जिउ तो सही? Read more: सूरज से गुफ्तगू #17

सूरज से गुफ्तगू #17

सुन आज कोई बात नहीं करते हैं तेरे फिर से डूब जाने की बात नहीं करते हैं, तेरे, हर शाम के बाद वह बदलते हुए चाँद के पास जाने की बात नहीं करते हैं तुजे यु किसी से बाटने की बात नहीं करते हैं, हमारे कभी न मिल पाने की बात नहीं करते हैं सुनContinue reading “सूरज से गुफ्तगू #17”

सूरज से गुफ्तगू #16

तुम कहते नहीं पर मुझपे मरते ज़रूर होतुम थकते नहीं पर मुझे ख्वाबो में देखने को थोड़ी देर सोते जरूर हो,तुम्हारे होठों पे सजी इबादत में, मैं हूँतुम्हारे सीने में छिपी वो सुकून की चाह में, मैं हूँ,तुम कहते नहीं पर रातो से नफरत तुम्हे भी हैंतुम कहते नहीं यार, पर मेरी वो हर अनकहीContinue reading “सूरज से गुफ्तगू #16”

सूरज से गुफ्तगू #15

एक नयी उम्र मांग के लायी हूँ मैं वापिसएक और सांज तेरे साथ गुज़ारने आयी थी मैं हाफ़िज़,कुछ चंद आरज़ू में निकल गएकुछ तेरे इंतज़ार में,रेहम थोड़ी कर- तेरे जाने के बाद कल तू फिर चला आएगामैं चल गयी तो मेरा खोया वक़्त फिर कहा आएगा। Read more: सूरज से गुफ्तगू #14

A Discourse In Distortion

An infinite jigsaw puzzle With distorted edges and a path of struggles No end in sight No pieces fit I haven’t found my own solution My failure, my only remission No answers, no sense, no meaning Only a delusion, a small chaos Why should be things easy to understand?  A puzzle in piece Or aContinue reading “A Discourse In Distortion”

An Ode To 2020

Women, wrong; Men, wrong Blame patriarchy A trend set fake feminism. Truths hidden, sources misused Toxicity left, an only muse. Wander, wander around if you will Find, find the source if you will Failure, an only accomplice. Poverty and texture in coarse rumblings Death_ No food A trickle of water? Lost families Lost homes WhereContinue reading “An Ode To 2020”