सूरज से गुफ्तगू #19

तुम एक ख्वाब होतुम से मिलने की एक अनकही चाहत है,कब तक नज़्मों में बाते करू तुमसेकब तक वो किताबो वाला इश्क़ करू तुमसे?अब है तेरी बारी, मुक्कम्मल कर मेरे ख्वाबचाहे फिर क्यों न करनी पड़े जंग तुजे उसे रब से ही आज। Read More: सूरज से गुफ्तगू #18 PS: If anyone remembers, I have aContinue reading “सूरज से गुफ्तगू #19”