The Wait For Spring.

Warning: This is going to be pretty long. Proceed and get bored at your own risk!   * I should probably start with wishing new years to all of you, but I am sure that I am very late for that, very very late. So, shall I just go ahead and ask you if youContinue reading “The Wait For Spring.”

सूरज से गुफ्तगू #13

कभी कभी जब अकेले रोती हूँ तो रातो को भी तेरा इंतज़ार करती हूँ कभी कभी, जब अकेले में सोती हूँ तो खुद की उंगलियों से यु सिलवटे तेरी बना जाती हूँ तेरे बाहों में सिमटना चाहती हूँ कुछ देर ही सही, तुजसे दिल का हर राज़ कहना चाहती हूँ. तू समझता नहीं मेरी प्यासContinue reading “सूरज से गुफ्तगू #13”

Moorings.

  Weekends shouldn’t be about going out, partying, trashing, shopping, dining, and tiring yourself. They should be about the things that you would want to do otherwise. It should be about, well, honestly my answer changes as frequently as the illogical and unwanted threats, thrown by people who might run a country and yet wouldn’tContinue reading “Moorings.”

सूरज से गुफ्तगू #12

तू ढूंढ रहा है कुछ ऐसा सुना है मैंने तू खो चूका है कुछ ऐसा पता लगा है मुझे. अधूरा अधूरा सा लग रहा होगा न जैसे मुझे अब तक लगता था आज तक तूने कहा था चल आज मै तुजसे वही बात कहती हूँ नहीं पायेगा मुझे जब तक मिश्री सा घुल नहीं जाताContinue reading “सूरज से गुफ्तगू #12”

सूरज से गुफ्तगू #11

सुन, तू कब से काबिल हो गया यु गम छुपाने में तू कब से यु हिचकिचाने लगा खुल के मुस्कराने में कोई पुरानी छूटी हुई ख़ुशी याद आयी है या बस मुझसे दूर जाने की रुस्वाई है? कुछ और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू #10

सूरज से गुफ्तगू #10

दिल तो मशवरे नहीं करता मुझसे क्या तू भी अब नहीं करेगा गम रास आने लगा था मुझे क्या तू भी अब ग़मज़ादा हो जायेगा? कुछ और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू #9

सूरज से गुफ्तगू #9

सुनो थोड़ा ठहर जाओ तुमसे एक बात केहनी थी, वो बस सुनते जाओ दिल आज फिर भर आया है मै, रात तुम्हारे आने के इंतज़ार में काट लुंगी तुम बस शाम सहारा बनते जाओ, सुनो, बस थोड़ा ठहर जाओ.   कुछ और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू#8

सूरज से गुफ्तगू#8

वो कहता है बारिश भी पसंद है वो कहता है सूरज भी पसंद है, देखो, दोनों का मेल नहीं हो सकता इंद्रधनुष सा जादू हर किसी के नसीब में नहीं हो सकता. कुछ और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू #7

The Sea

Poetry has been a consistent part of my life, first reading and then writing. Though if someone would have said that I could try writing poems, a year back, I would have rolled my eyes and said, “Yeah, right!” Not that I have become very confident of my pieces, but I have come as farContinue reading “The Sea”

सूरज से गुफ्तगू #7

क्या यार तुम आज फिर चुप गये देखो ये रोज रोज का रूठना मनाना नहीं चलेगा तुम्हारा रोज यु हमसे दूर जाना नहीं चलेगा. हमने तो कभी कहा नहीं की हमे बारसात पसंद है हमे तो तुम्हारी वो दूर से भेजी रंगीन आहट ही पसंद है हमने कब कहा की हमे वो पेड़ से टूटContinue reading “सूरज से गुफ्तगू #7”