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The Sea

Poetry has been a consistent part of my life, first reading and then writing. Though if someone would have said that I could try writing poems, a year back, I would have rolled my eyes and said, “Yeah, right!” Not that I have become very confident of my pieces, but I have come as far as trying to share them and be judged.

So, judge away a small poem that has been accepted for publication by Indian Periodical:

The Sea

Do share with me what you think about this. It is always amazing to hear from you, and helpful to hear an honest opinion.

magic

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सूरज से गुफ्तगू #7

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क्या यार तुम आज फिर चुप गये
देखो ये रोज रोज का रूठना मनाना नहीं चलेगा
तुम्हारा रोज यु हमसे दूर जाना नहीं चलेगा.
हमने तो कभी कहा नहीं की हमे बारसात पसंद है
हमे तो तुम्हारी वो दूर से भेजी रंगीन आहट ही पसंद है
हमने कब कहा की हमे वो पेड़ से टूट ते पत्ते पसंद है
हमे तो वो ढलती शाम के बेहतरीन बादल ही पसंद है
हमने कब कहा की हमें वो कीचड़ में छप-छपाये पैरों के निशाँ पसंद है
हमे तो तुम्हे देख कर शर्म से लाल होना ही पसंद है.

 

थोड़ी और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू #6

 

सूरज से गुफ्तगू #6

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चलो जाओ, नहीं करनी तुमसे कोई मुलाकात
तुम नहीं चाहते तो नहीं करनी तुमसे कोई बात
दूर-दूर ही अच्छे हो
चाँद क बिना ही पुरे हो.
शायद इसी बात का गुर्रर है
चांदनी से पहले जो तुमसे मोहब्बत का इकरार किया है.
हमने तो कोई पर्दा न रखा था
पर तुम्हारे सुरूर का ताप ही गहरा था.
चल आज से सब बदल जायेगा
तेरी जगह चाँद का नाम लिया जायेगा
आज से रात को ही सपने  देखेंगे
सौंदर्य की जगह चांदनी को दे देंगे
बोल अगर है तुजे मंजूर
या फिर है तुजे मेरी ही मोहब्बत कबूल?

PS: However cliche this may sound anyone saying Kabool, kabool, kabool will not be entertained.

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थोड़ी और गुफ्तगू : सूरज से गुफ्तगू #5

सूरज से गुफ्तगू #5

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बिखेर दिए है आज जो बदल भी तुमने
बस गए हो यु उसके भी दिल में
कुछ तो शर्म करो कितनो के दिल के तोड़ोगे
अब बस भी करो, मोहब्बत करता हु, ये कितनो से कहोगे.

थोड़ी और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू #4

सूरज से गुफ्तगू #4

First things first

#NoFilters

पागल ही कह लो
हम तो सूरज से भी बातें करते है,
ख़्वाबीदा ही कह लो
हम तो उससे मिलने का ख्वाब भी देखते है.

कुछ और गुफ्तगू उस अनजान सूरज से:

सूरज से गुफ्तगू #3

सूरज से गुफ्तगू #2

सूरज से गुफ्तगू #1

सूरज से गुफ्तगू #2

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आज फिर छुप गया था वो मुझसे
न जाने कम्बखत कितनी कहानिया छुपा रहा था मुझसे.

कुछ और शिकायते सूरज से : सूरज से गुफ्तगू #1

सूरज से गुफ्तगू #1

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तुम रोज जो छुप-छुप के
मुझे यु देखा करते हो,
सिर्फ नफरत ही है ज़ेहन में
या थोड़ी मोहब्बत भी किया करते हो?

PS: I refrain to translate them in English! I don’t think I can justify it!