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Her Mysterious Meshuga.

Hey folks, I hope you all are doing fine. I know I have been away for a long time, but I promise I’ll be back as soon as I can. Till then I am very pleased to share another poem of mine that has been published at Spillwords, a place where words matter. I sent them this piece a while back and was not even expecting them to revert back. However a couple of days ago I was notified that the poem is going to be published soon. And as always, I was elated to see my name in print.

I share below the link to the poem:

Her Mysterious Meshuga

Also, please be patient with me. I will be back to all my favourite writers. I, honestly, cannot wait to get lost in the magic of your words.

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Her Altruistic Mien.

Poetry has been a consistent part of my life, first reading and then writing. Though if someone would have said that I could try writing poems, a year back, I would have rolled my eyes and said, “Yeah, right!” Not that I have become very confident of my pieces, but I have come as far as trying to share them and be judged.

A few days back one of my poems got published in The Indian Periodical titled The Sea and today I am back with another of my poems which has been accepted for publication in an online magazine called Merak. I am thrilled. Not that I am suddenly very confident of what I am doing with these poems, but I am happy.

I am sharing the link to the poem below. Though some of my readers would have read it as a part of NAPOWRIMO which was again an amazing ride, I will be eager to hear from you about the piece.

Her Altruistic Mien

सूरज से गुफ्तगू #13

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कभी कभी जब अकेले रोती हूँ
तो रातो को भी तेरा इंतज़ार करती हूँ
कभी कभी, जब अकेले में सोती हूँ
तो खुद की उंगलियों से यु सिलवटे तेरी बना जाती हूँ
तेरे बाहों में सिमटना चाहती हूँ
कुछ देर ही सही, तुजसे दिल का हर राज़ कहना चाहती हूँ.
तू समझता नहीं मेरी प्यास को
तू बस जलना जनता है
तू कभी आता नहीं बेवजह बेवक़्त रात को
तू सिर्फ जलाना जो जनता है.

कुछ और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू #12

सूरज से गुफ्तगू #12

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तू ढूंढ रहा है कुछ
ऐसा सुना है मैंने
तू खो चूका है कुछ
ऐसा पता लगा है मुझे.
अधूरा अधूरा सा लग रहा होगा न
जैसे मुझे अब तक लगता था
आज तक तूने कहा था
चल आज मै तुजसे वही बात कहती हूँ
नहीं पायेगा मुझे
जब तक मिश्री सा घुल नहीं जाता तू मुजमे
नहीं खोज पायेगा मुझे
जब तक नहीं खो जाता तू, मुजमे.

कुछ और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू #11

सूरज से गुफ्तगू #11

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सुन, तू कब से काबिल हो गया यु गम छुपाने में
तू कब से यु हिचकिचाने लगा खुल के मुस्कराने में
कोई पुरानी छूटी हुई ख़ुशी याद आयी है
या बस मुझसे दूर जाने की रुस्वाई है?

कुछ और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू #10

सूरज से गुफ्तगू #10

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दिल तो मशवरे नहीं करता मुझसे
क्या तू भी अब नहीं करेगा
गम रास आने लगा था मुझे
क्या तू भी अब ग़मज़ादा हो जायेगा?

कुछ और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू #9

सूरज से गुफ्तगू #9

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सुनो थोड़ा ठहर जाओ
तुमसे एक बात केहनी थी, वो बस सुनते जाओ
दिल आज फिर भर आया है
मै, रात तुम्हारे आने के इंतज़ार में काट लुंगी
तुम बस शाम सहारा बनते जाओ,
सुनो, बस थोड़ा ठहर जाओ.

 

कुछ और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू#8