सूरज से गुफ्तगू #7

क्या यार तुम आज फिर चुप गये देखो ये रोज रोज का रूठना मनाना नहीं चलेगा तुम्हारा रोज यु हमसे दूर जाना नहीं चलेगा. हमने तो कभी कहा नहीं की हमे बारसात पसंद है हमे तो तुम्हारी वो दूर से भेजी रंगीन आहट ही पसंद है हमने कब कहा की हमे वो पेड़ से टूटContinue reading “सूरज से गुफ्तगू #7”

A Barbarous Bogart.

Garbed in a glorious bedlah She tranced towards me like a Cinderella, With mischievous eyes and a coy smile She perpetuates my wait, longer than the river Nile.   She sways her waist with obtuse precision Making my lust ameliorate with elysian, Her biased hips, her light feet transfix me And I want myself toContinue reading “A Barbarous Bogart.”